सोमवार, 17 जनवरी 2011

मनुष्य कि स्मृति


मनुष्य कि सोच अदभुत , मगर भ्रामक उपकरण होती है !
हमारे  भीतर रहने वाली स्मृति न तो पत्थर पर उकेरी गई
कोई पंक्ति है और न ही एसी कि समय गुजरने के साथ
धुल जाये , लेकिन अक्सर वह बदल जाती है , या कई बाहरी
आकृति से जुड़ जाने के बाद बढ जाती है !

5 टिप्‍पणियां:

Patali-The-Village ने कहा…

बिलकुल सही विचार हैं आप के| धन्यवाद|

Bhushan ने कहा…

संस्कार पर संस्कार पर पड़ते जाते हैं. यही मन की कार्यप्रणाली है. बहुत अच्छा सुविचार.

Bhushan ने कहा…

टिप्पणी करने के लिए शब्द पुष्टि करण (word verification) की प्रक्रिया हटा दें तो आसानी होगी.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

समय और वातावरण के अनुसार सोच बदलती है ...

Minakshi Pant ने कहा…

shukriya dosto