तन्हाइयां देख दर्द , अक्सर दस्तक देती रही | किसी से कुछ न कह ...खामोशियों में पलती रही | आह ने जब भी , भीतर करवट ली |माहोले सुकून में , गमगिनियाँ सी छाती रही |ये बेजुबान दर्द ही , जीने के मायने समझाती रही |और बेहतर जिन्दगी कि खातिर , ये हरदम मेरे साथ रही |

आइने के सामने से , जो मैं गुजरी तो , उसी पल ठिठक कर , ठहर गई |चेहरे पर , उम्र की लकीरों को देख...यक़ीनन मैं थी डर गई |पर उसी पल होंठों पर सुकूने मुस्कान भी बिखर गई |शायद दिल में ... बीते लम्हों को इत्मिनान से जीने का सकून था |और आज भी खुद पर भरोसा मुझे बेहिसाब था |