गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

वो बंद किताबें




बंद कमरे में बंद किताबों सी पड़ी रहती है  ....
न जाने कौन सा वर्क कब कोई इतिहास रच जाये ....
कई दास्ताँनें  बंद है इन किताबों में  ....
पर कोई पन्नों को  पलटता ही नहीं ....
बस खामोश रहकर खुली आँखों से तकती है ,
ये वो दीवारे ......
जिन्हें रंगने भी कोई न आया आजतक  .....
हाँ दीवारों में कुछ रंग पहले से हैं मौजूद .....
जिन्हें देख - देखकर आँखों को सुकून ...
आया है अभी तक ....
पर दीवारों के वो बड़े - बड़े पेच .....
जिन्हें देखकर बरबस परेशान होता है ये मन
फिर भी इसे देखने , न रंगने कोई आया अभी तक .....

8 टिप्‍पणियां:

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

intzaaar karna hoga..
kabhi to kitabo ka pathak aayega..
kabhi to darwaja khulega..
kabhi to gharrr ki awaaj ke saath pallle khulenge darwaje ke:))
behtareen!!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

कल 26/10/2012 को आपकी यह खूबसूरत पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

mridula pradhan ने कहा…

bahot achchi lagi.....

Kuldeep Sing ने कहा…

पर दीवारों के वो बड़े - बड़े पेच .....
जिन्हें देखकर बरबस परेशान होता है ये मन
फिर भी इसे देखने , न रंगने कोई आया अभी तक .....

सुंदर भाव... http://wwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwww.kuldeepkikavita.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

गहन अभिव्यक्ति .....

hridyanubhuti ने कहा…

बेहद गहन रचना .......

expression ने कहा…

अच्छी कविता...
गहन अभिव्यक्ति.....

सादर
अनु

Minakshi Pant ने कहा…

सभी दोस्तों का तहे दिल से शुक्रिया |