रविवार, 20 फ़रवरी 2011

प्रेम दो मांगो नहीं


प्रेम को परखो , प्रेम को देखो 
प्रेम मै ही कुछ  गलत छिपा है 
प्रेम के वस्त्रो मै है  जंजीरे  
बाहर आवरण , अन्दर कुछ और छुपा है 
तुम बनना तो चाहते हो उसके मालिक 
और करना चाहते हो उसपर कब्ज़ा... 
प्रेम तो  कोई वस्तु नहीं ?
जो तुम  उसका  करो एसे  उपयोग 
उससे होता उसका अपमान ... 
क्युकी कोई नहीं परतंत्रता चाहता 
अगर प्रेम  तुम चाहते हो 
तो बंधन मै क्यु बाँधते हो ?
इसी शर्त से प्रेम को है डर लगता 
और इसी डर से वो हमसे दूर  है रहता 
इसलिए अपने प्रेम को एसे  तुम शुद्ध करो 
तुम दो सबको , और मांगने की इच्छा ...
हरगिज़ तुम  ना करो !

7 टिप्‍पणियां:

mridula pradhan ने कहा…

इसलिए अपने प्रेम को एसे तुम शुद्ध करो
तुम दो उसको और मांगने की इच्छा ..............
हरगिज़ न तुम करो !bahut sunder vicharon wali kavita.

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

kya yahi prem hai??

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

बहुत अच्छा सन्देश है .....
विश्वास जरुरी है प्रेम में ......

महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

अगर प्रेम तुम चाहते हो
तो बंधन मै क्यू बाँधते हो ?
इसी शर्त से प्रेम को है डर लगता
और इसी डर से वो हमसे दूर है रहता

प्रेम निर्बन्ध रहना चाहता है, बिना शर्त के...।

बेनामी ने कहा…

सशक्त चिंतन..

देवेंद्र ने कहा…

मीनाक्षी जी बिना-शर्त प्रेम की इतनी सुन्दर व्याख्या की है आपने । साधुवाद।
इसीलिए केवल माँ का वात्सल्य प्रेम ही उस परमपिता के सत्य-प्रेम के निकटतम् कोटि में आता है । इसीलिए तो नारद जी को उपदेश देते हुए कहते हैं-

करहुँ सदा तिन्ह कै रखवारी । जिमि बालक राखहिं महतारी ।।
(रामचरित मानस, अरण्य कांड)

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो .....