
कई बार था यकीं दिलाया कि
मैं गुनाहगार नहीं ...
पर ज्यों - ज्यों प्रतिकार करती
त्यों - त्यों अपराध बढ़ता जाता
मैं जिद्दी , उद्दंड कहलाने लगी
जबकि दोष अपना कुछ भी न था
पर खुद को सही साबित करना
अविश्वास को बढ़ावा देना जैसा ही हुआ
न किया गया अपराध भी अपराध जैसा लगने लगा |
3 टिप्पणियां:
good....
बहुतों की अनुभूति को आपने शब्दों के द्वारा आकार प्रदान किया हैं।
दोष अपना कुछ भी न था
पर खुद को सही साबित करना अविश्वास को बढ़ावा देना जैसा ही हुआ
न किया गया अपराध भी अपराध जैसा लगने लगा…
छोड़िए न …!
कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम है कहना ...!!
आदरणीया मीनाक्षी जी !
अच्छी रचना है…
सुंदर भाव ! सुंदर शब्द !
आभार …
बनी रहे त्यौंहारों की ख़ुशियां हमेशा हमेशा…
ஜ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●ஜ
♥~*~दीपावली की मंगलकामनाएं !~*~♥
ஜ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●ஜ
सरस्वती आशीष दें , गणपति दें वरदान
लक्ष्मी बरसाएं कृपा, मिले स्नेह सम्मान
**♥**♥**♥**●राजेन्द्र स्वर्णकार●**♥**♥**♥**
ஜ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●ஜ
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